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5.9patgendraa/जड़ भरत ब्राह्मण कुल में

 सच है, महापुरुषों के प्रति किया हुआ अत्याचार रूप अपराध इसी प्रकार ज्यों का त्यों अपने ही ऊपर पड़ता है। 19

परीक्षित! जिनकी देह अभिमानरुप शुद्र हृदय ग्रंथि छूट गई है, जो समस्त प्राणियों के सुहृद एवं आत्मा तथा वैरहीन है, साक्षात भगवान की भद्रकाली आदि भिन्न-भिन्न रूप धारण करके अपने कभी ना चूकने वाले कालचक्र रूप श्रेष्ठ शस्त्र से जिनकी रक्षा करते हैं और जिन्होंने भगवान के निर्भय चरण कमलो का आश्रय ले रखा है- उन भगवत भक्त परमहंसओं के लिए अपना सिर कटने का अवसर आने पर भी किसी प्रकार व्याकुल ना होना-यह कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है। 20

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20/5/20जन्म मृत्यु।

*संपूर्ण प्राणी जन्म से पहले है अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं,केवल बीच में ही प्रकट है; फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना।* श्री कृष्ण