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5.8 patgendraa/मृग. मोह.योनि.

अहो! बड़े खेद की बात है मैं संयम सील महानुभाव के मार्ग से प्रतीत हो गया मैंने तो धैर्य पूर्वक सब प्रकार की आसक्ति छोड़कर एकांत और पवित्र वन का आश्रय लिया था वहां रहकर जिस चित्र को मैंने सर्व भूतात्मा श्री वासुदेव में निरंतर उन्हीं के गुणों का श्रवण मनन और संकीर्तन करके तथा प्रत्येक पल को उन्हीं की आराधना और स्मरण आदि से सफल करके स्त्री भाव से पूर्णतया लगा दिया था ,
मुझ अज्ञानी का वही मन अकस्मात एक नन्हे से हर इन शिशु के पीछे अपने लक्ष्य से चुप हो गया। 29

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परा अपरा ,पुरुष प्रकृति।

मैं संपूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूं अर्थात संपूर्ण जगत का मूल कारण हूं। पृथ्वी, जल अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी जड़ अर्थात अपरा प्रकृति है। इससे दूसरी जिससे यह संपूर्ण जगत धारण किया जाता है मेरी जीव रूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जान।। ।।श्री कृष्ण ।।