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5.7 भरत चरित्र

भरत s/o ऋषभदेव h/o पंचजनी f/o सुमति, राष्ट्र भृत, सुदर्शन, आवरण और धूम्र केतु,r/o अजनाभ-वर्ष (हाला) भारत वर्ष.

उदित हुए सूर्य मंडल में सूर्य संबंधिनी ऋचाओं द्वारा ज्योतिर्मय परमपुरुष भगवाननारायण की आराधना करते और इस प्रकार कहते -

"भगवान सूर्य का कर्मफलदायक तेज प्रकृति से परे है। उसीने संकल्प द्वारा इस जगत की उत्पत्ति की है। फिर वही अंतर्यामी रूप से इसमें प्रविष्ट होकर अपनी चित्त-शक्ति द्वारा विषय लोलुप जीवों की रक्षा करता है। हम उसी बुद्धिप्रवर्तक तेज की शरण लेते हैं।"

भागवत महापुराण स्कंध 5 अध्याय 7 श्लोक 14.

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परा अपरा ,पुरुष प्रकृति।

मैं संपूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूं अर्थात संपूर्ण जगत का मूल कारण हूं। पृथ्वी, जल अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी जड़ अर्थात अपरा प्रकृति है। इससे दूसरी जिससे यह संपूर्ण जगत धारण किया जाता है मेरी जीव रूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जान।। ।।श्री कृष्ण ।।