भरत s/o ऋषभदेव h/o पंचजनी f/o सुमति, राष्ट्र भृत, सुदर्शन, आवरण और धूम्र केतु,r/o अजनाभ-वर्ष (हाला) भारत वर्ष.
उदित हुए सूर्य मंडल में सूर्य संबंधिनी ऋचाओं द्वारा ज्योतिर्मय परमपुरुष भगवाननारायण की आराधना करते और इस प्रकार कहते -
"भगवान सूर्य का कर्मफलदायक तेज प्रकृति से परे है। उसीने संकल्प द्वारा इस जगत की उत्पत्ति की है। फिर वही अंतर्यामी रूप से इसमें प्रविष्ट होकर अपनी चित्त-शक्ति द्वारा विषय लोलुप जीवों की रक्षा करता है। हम उसी बुद्धिप्रवर्तक तेज की शरण लेते हैं।"
*संपूर्ण प्राणी जन्म से पहले है अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं,केवल बीच में ही प्रकट है; फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना।* श्री कृष्ण
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