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5.14patgendraa:भवाट्वीका स्पष्टीकरण

देहअभिमानी जीवों के द्वारा सत्वादि गुणों के भेद से शुभ, अशुभ और मिश्र_तीन प्रकार के कर्म होते रहते हैं। उन कर्मों के द्वारा ही निर्मित नाना प्रकार के शरीरों के साथ होने वाला जो संयोग_वियोगआदिरूप अनआदि संसार जीव को प्राप्त होता है, उसके अनुभव के 6 द्वार हैं _मन और पांच ज्ञानेंद्रियां।

ॐ भागवत स्कंध 5/अध्याय14/श्लोक 1

जिस प्रकार यदि किसी खेत के बीजों को अग्नि द्वारा जला न दिया गया हो, तो प्रतिवर्ष जोतने पर भी खेती का समय आने पर वह फिर झाड़_झंकाड,लता और तृणआदि से गहन हो जाता है_ उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मों का सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, क्योंकि यह घर कामनाओं की पिटारी है।

ॐ भागवत स्कंध 5/अध्याय 14/श्लोक 4

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*संपूर्ण प्राणी जन्म से पहले है अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं,केवल बीच में ही प्रकट है; फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना।* श्री कृष्ण