जिस काल में यह जीव मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भलीभांति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
*संपूर्ण प्राणी जन्म से पहले है अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं,केवल बीच में ही प्रकट है; फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना।* श्री कृष्ण
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